मिजोरम भूकंपीय क्षेत्र(Mizoram Seismic Zone)


मिजोरम में 21 जून से 9 जुलाई के मध्य कम से कम आठ मध्यम स्तर के भूकंपों का अनुभव किया गया। रिक्टर पैमाने पर इन भूकम्पो की तीव्रता 4.2 से 5.5 तक दर्ज की गयी।

इनमें से अधिकांश भूकंपों का अधिकेन्द्र म्यांमार की सीमा से लगे हुए चंपई जिले (Champhai district) के नीचे था।

हाल ही में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, मिजोरम दो अधःस्थलीय भ्रंशों– चूड़ाचांदपुर माओ भ्रंश (Churachandpur Mao Fault) तथा मैत भ्रंश (Mat Fault) के मध्य आ गया है।

  1. चूड़ाचांदपुर माओ भ्रंश, का नामकरण मणिपुर के दो स्थानों के नाम पर किया गया है तथा यह चंपई के सीमा के साथ-साथ उत्तर-दक्षिण दिशा में म्यांमार में विस्तारित है।

  2. मैत भ्रंश (Mat Fault) मिजोरम में सेरछिप ज़िले के समीप मैत नदी (river Mat) के नीचे उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम दिशा में विस्तारित है।

इन दो प्रमुख भ्रंशों के मध्य कई उथले अनुप्रस्थीय अथवा छोटे भ्रंश पाए जाते है।

भ्रंश क्या होते है?

भ्रंश, भूगार्भिक हलचलों के परिणामस्वरूप विवर्तनिक प्लेटों पर अत्याधिक दबाव अथवा तनाव के कारण भू-पर्पटी की शिलाओं में होने वाले विस्थापन से निर्मित होते हैं। इन भ्रंशो के सहारे भूकंप आने पर भू-पर्पटी की शिलायें एक दूसरे के सापेक्ष ऊपर अथवा नीचे की ओर सरक जाती है।

  • भ्रंशो की लम्बाई कुछ सेंटीमीटर से लेकर हजारों किलोमीटर तक हो सकती है।

  • भ्रंश-सतह ऊर्ध्वाधर, क्षैतिज अथवा पृथ्वी की सतह पर कुछ कोण पर हो सकती है।

  • भ्रंश, पृथ्वी में गहराई तक विस्तारित हो सकते है तथा पृथ्वी की सतह तक भी फैल सकते हैं।

fault

 

प्लेट विवर्तनिकी, प्लेट टेक्टोनिक्स क्या है? 

(अंग्रेज़ी: Plate tectonics) एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है जो पृथ्वी के स्थलमण्डल में बड़े पैमाने पर होने वाली

गतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। साथ ही महाद्वीपों, महासागरों और पर्वतों के रूप में धरातलीय उच्चावच

के निर्माण तथा भूकम्प और ज्वालामुखी जैसी घटनाओं के भौगोलिक वितरण की व्याख्या प्रस्तुत करने का

प्रयास करता है।


यह सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में अभिकल्पित महाद्वीपीय विस्थापन नामक संकल्पना से

विकसित हुआ जब 1960 के दशक में ऐसे नवीन साक्ष्यों की खोज हुई जिनसे महाद्वीपों के स्थिर होने की

बजाय गतिशील होने की अवधारणा को बल मिला। इन साक्ष्यों में सबसे महत्वपूर्ण हैं पुराचुम्बकत्व से सम्बन्धित

साक्ष्य जिनसे सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई। हैरी हेस के द्वारा सागर नितल प्रसरण की खोज से इस

सिद्धान्त का प्रतिपादन आरंभ माना जाता है[1] और विल्सन, मॉर्गन, मैकेंज़ी, ओलिवर, पार्कर इत्यादि विद्वानों

ने इसके पक्ष में प्रमाण उपलब्ध कराते हुए इसके संवर्धन में योगदान किया।

 

इस सिद्धान्त अनुसार पृथ्वी की ऊपरी लगभग 80 से 100 कि॰मी॰ मोटी परत, जिसे स्थलमण्डल कहा जाता है

और जिसमें भूपर्पटी और भूप्रावार के ऊपरी हिस्से का भाग शामिल हैं, कई टुकड़ों में टूटी हुई है जिन्हें

प्लेट कहा जाता है। ये प्लेटें नीचे स्थित एस्थेनोस्फीयर की अर्धपिघलित परत पर तैर रहीं हैं और सामान्यतया

लगभग 10-40 मिमी/वर्ष की गति से गतिशील हैं हालाँकि इनमें कुछ की गति 160 मिमी/वर्ष भी है।

इन्ही प्लेटों के गतिशील होने से पृथ्वी के वर्तमान धरातलीय स्वरूप की उत्पत्ति और पर्वत निर्माण की व्याख्या

प्रस्तुत की जाती है और यह भी देखा गया है कि प्रायः भूकम्प इन प्लेटों की सीमाओं पर ही आते हैं

और ज्वालामुखी भी इन्हीं प्लेट सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं।

प्लेट सीमायें

प्लेट सीमाओं के तीन प्रकार

प्लेटों की गतिशीलता के कारण इनके के किनारे या सीमायें तीन प्रकार के पाए जाते हैं[12][13]:

विनाशात्मक/अभिसारी किनारा

इस प्रकार के किनारों के सहारे दो प्लेटें एक दूसरे की ओर गति करती हैं और टकराकर उनमें से भारी प्लेट

हलकी प्लेट के नीचे क्षेपित होती है। मुड़कर नीचे की ओर क्षेपित होने वाला यह हिस्सा गहराई में जा कर

ताप और दाब की अधिकता के कारण पिघलकर मैग्मा में परिवर्तित होता है।[13] जिस गहराई पर यह घटना

होती है उसे क्षेपण मण्डल या बेनीऑफ़ ज़ोन कहते हैं। ऐसे किनारों के सहारे भूसन्नतियों के पदार्थ दबाव के कारण

मुड़कर पर्वतों का निर्माण करते हैं। नीचे जाकर पिघला पदार्थ मैग्मा प्लूम के रूप में ऊपर उठ कर

ज्वालामुखीयता भी उत्पन्न करता है।

रचनात्मक/अपसारी किनारा

जहाँ दो प्लेटें एक दूसरे के विपरीत गतिशील होती हैं, अर्थात एक दूसरे से दूर हटती हैं वहाँ नीचे से मैग्मा ऊपर 
उठकर नयी प्लेट का निर्माण करता है। इन किनारों पर पाए जाने वाले सबसे प्रमुख स्थलरूप मध्य महासागरीय
कटक हैं।[13] जब यह किनारा किसी महाद्वीप पर स्थित होता है तो रिफ्ट घाटियों का निर्माण होता है।[13] नयी
प्लेट के निर्माण के कारण इसे रचनात्मक किनारा भी कहते हैं।

अपसारी किनारे के सहारे एक रिफ्ट घाटी, आइसलैंड में


संरक्षणात्मक किनारा

संरक्षी किनारा वह है जिसके सहारे दो प्लेटे एक दूसरे को रगड़ते हुए गतिशील हों, अर्थात न तो अपसरण

हो रहा हो न ही अभिसरण। सामान्यतः इस किनारे के सहारे एक दूसरे को रगड़ते हुये विपरीत दिशाओं में

गतिशील होती हैं किन्तु यह अनिवार्य नहीं है, यदि दो प्लेटें एक ही दिशा में गतिशील हों और उनकी गति

अलग-अलग हो तब भी उनके किनारे रगड़ते हुये संरक्षी किनारा बना सकते हैं। इनके सहारे ट्रांसफोर्म भ्रंश

पाए जाते हैं। चूँकि इनके सहारे न तो प्लेट (क्रस्ट या स्थलमण्डल) का निर्माण होता है और न ही विनाश,

अतः इन्हें संरक्षी/संरक्षणात्मक किनारे कहते हैं जहाँ निर्माण/विनाश के सन्दर्भों में यथास्थिति संरक्षित रहती है।

भ्रंश के प्रकार

तनाव मूलक भूसंचलन की तीव्रता के कारण भूपटल की शैलों में एक तल के सहारे उत्पन्न दरार या विभंग (fracture) जिसमें विभंगतल के सहारे बड़े पैमाने पर शैल खंडों का स्थानांतरण होता है। जिस तल के सहारे भ्रंश का निर्माण होता है उसे भ्रंश तल (fault plane) कहते हैं।

 

भ्रंश मुख्यतः चार प्रकार की होती हैं- सामान्य भ्रंश, व्युत्क्रम भ्रंश, पार्श्विक भ्रंश (नतिलंब सर्पण भ्रंश), और सोपान भ्रंश। जब किसी भ्रंशतल के सहारे दोनों ओर के शैल-खंड विपरीत दिशाओं में सरकते हैं, सामान्य भ्रंश (normal fault) का निर्माण होता है। इसमें शीर्षभित्ति भ्रंशतल के सहारे नीचे की ओर सरक जाती है जिससे भ्रंशतल का ढाल प्रायः खड़ा या तीव्र होता है।

 

व्युत्क्रम भ्रंश (reverse fault) में भ्रंशतल के सहारे दो शैल-खंड आमने-सामने खिसकते हैं और एक शैल खंड दूसरे शैलखंड पर चढ़ जाता है। भ्रंशतल के सहारे शैल खंडों में क्षैतिज संचलन होने पर पार्श्विक भ्रंश (lateral fault) का निर्माण होता है जिसमें कगारों की रचना बहुत कम हो पाती है। जब किसी भूभाग में कई समानांतर भ्रंशें इस प्रकार पायी जाती हैं कि सभी भ्रंशतल के ढाल की दिशा समान हो, इसे सोपानी भ्रंश (step fault) कहते हैं।

 

भ्रंशन क्रिया द्वारा स्थलखंड का कुछ भाग ऊपर तथा कुछ भाग नीचे की ओर स्थानांतरित हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप कई प्रकार के स्थलरूपों का निर्माण होता है जिनमें रिफ्ट घाटी, ब्लाक पर्वत, होर्स्ट, ग्राबेन आदि अधिक महत्वपूर्ण हैं।

 

यह पृथ्वी की भूपटल में हुई टूटन है, जिसमें चट्टानें एक-दूसरे के सापेक्ष इसी के सामांतर विस्थापित होती है। यह कुछ सेंटीमीटर से लेकर कई किलोमीटर तक हो सकता है। विस्थापन का स्वरूप क्षैतिज, तिर्यक या लंबवत हो सकता है।


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